Diwali Ya Pradooshan?

गुज़ारिश है एक बार पूरा पढ़े।
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नमस्ते दोस्तों।
यह लेख हम सिर्फ कुछ दोगले लोगों के लिए लिख रहें हैं। जो दिखते कुछ और हैं और होते कुछ और हैं।
हमारा जीवन में यही सिद्धांत है कि जियो और जीने दो। लेकिन शायद दूसरे लोगों ने यह सिद्धांत अपनाया हुआ है कि हर एक बात में अपनी टांग अड़ाओ और उनकी हर एक बात को गलत साबित करो। यही बात शायद हिन्दू त्योहारों पर भी कुछ लोग करते हैं।
नहीं नहीं हम यहाँ पर किसी और धर्म के त्योहार पर टिप्पणी बिल्कुल नहीं करना चाहते। बस हम इतना कहना चाहते हैं कि जब हमें किसी और के त्योहारों से कोई आपत्ती नहीं है तो बाकी सब को क्यों है?
और इसमें दूसरे लोग नहीं अपने ही लोग शामिल हैं। दीवाली पर प्रदूषण होता है, पटाखे न जलाए।
बिल्कुल सही, हम भी इसके सख्त खिलाफ हैं। पर हम पर्यावरण को बचाने के लिए अपने घर में कूलर का इस्तेमाल करते हैं। जो भी बुद्धिजीवी लोग पटाखे न जलाने की सलाह देते हैं वे पूरे दिन AC की हवा खाने के बाद ये सब बोलते हैं। पर्यावरण बचाने के लिए ज़रा AC छोड़ कर दिखाए पहले, उसके बाद बात करेंगे।
यह बाद सिर्फ पटाखे जलाने की नहीं है। बल्कि हर छोटे त्योहार को निशाना बनाया जाता है। जिससे हमें सख्त आपत्ति है। ‘दीवाली पर पटाखों के शोर से जानवर परेशान होते हैं।’ अनुष्का शर्मा जी ने यह कहा था, पर ईद पर उनका ट्वीट था कि वे मटन पुलाव के मजे ले रही हैं। बात यहाँ पर यह नहीं है की किसी गलती न दिखाई जाए। बात यहाँ पर यह है कि आप एक चीज़ पर स्टैंड ले रहे हैं और दूसरी बार आप अपनी हरकतों से अपनी ही कही बात को ही झूठा साबित कर रहें हैं। यह दोगलापन बर्दाश्त नहीं होता है बस।
जानवर को पटाखे के शोर से परेशानी होगी, बिल्कुल सही। पर जब वह मर रहा होगा उस वक़्त तो शायद उसे सबसे ज्यादा परेशानी होगी। लेकिन उस वक़्त अभिनेत्री जी को उसके दर्द उसकी तड़प से क्या लेना देना, तब तो वह सिर्फ अपनी जीभ के बारे में सोच रहीं थी।
ऐसी ही एक और अभिनेत्री हैं जो अब बाहर रहने लगीं हैं, प्रियंका चोपड़ा। उन्हें अस्थमा है, दीवाली का प्रदूषण उनसे बर्दाश्त नहीं होता दम धुटने लगता है उनका। और जानवरों की परेशानी उनसे भी नहीं देखी जाती है। लेकिन अपनी शादी पर उनका अस्थमा खत्म हो जाता है, और जानवरों के प्रति प्रेम भी कम पड़ जाता है शायद।
ऐसे ही बाकी त्योहारों पर भी होता है। यहाँ मुझे किसी जाति या कौम से कोई शिकायत नहीं है। हम भी चाहते हैं कि सभी लोग अपना त्योहार अपने रीति रिवाज से ही मनाये। यहाँ शिकायत ऐसे दोगले लोगों से है जो दिखाते ऐसे हैं जैसे क्या कर गुज़रेंगे लेकिन जब खुद पर बात आती है तो सारी इंसानियत अपने पल्ले से झाड़ देते हैं ये लोग। ये लोग बेपेंदी के लोटे की तरह होते हैं जो कभी भी कहीं भी लुढक जाते हैं। इन्हें न पर्यावरण से कोई सरोकार है और न ही किसी की खुशी से, इन्हें सिर्फ पैसे से मतलब है।
पर्यावरण को हम भी बचाना चाहते हैं और हम भी खुशी खुशी कुछ चीजों को छोड़ सकते हैं। पर जो लोग ये अपील करते हैं क्या वे खुद ये सब छोड़ सकते हैं?
ऐसा हमे पढ़ाया गया है कि यदि आपको समाज मे कोई उदाहरण बनना है तो पहले खुद को बदलना होगा। यदि खुद को नहीं बदल सकते, यदि खुद जानवरों से इतना प्यार दिखाने के बाद भी आपको मटन बिरयानी खानी है, यदि आपकी खुद की शादी पर आपको पटाखे जलाने से कोई आपत्ति नहीं है तो कृपया अपने घड़ियाली आँसू ले कर कहीं और जाए।
क्योंकि बदलाव पहले खुद से शुरू होता है।

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